
लंबे समय तक यह माना जाता रहा कि गणित एक ऐसा विषय है जिसे बच्चे केवल औपचारिक शिक्षा के माध्यम से सीखते हैं। परंतु पिछले चार दशकों में विकासात्मक मनोविज्ञान (Developmental Psychology), संज्ञानात्मक विज्ञान (Cognitive Science) और तंत्रिका विज्ञान (Neuroscience) के अनेक शोधों ने इस धारणा को चुनौती दी है।
आज पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध हैं जो संकेत देते हैं कि मानव शिशु जन्म के कुछ ही महीनों के भीतर छोटी मात्राओं (small quantities) में अंतर पहचान सकते हैं, भले ही वे न गिन सकते हों और न ही संख्या शब्दों (एक, दो, तीन) को जानते हों। इस प्रारंभिक क्षमता को संख्या बोध (Number Sense) या न्यूमेरोसिटी (Numerosity) कहा जाता है।
यह लेख उन प्रमुख शोधों की चर्चा करता है जिन्होंने यह समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई कि गणितीय सोच की शुरुआत औपचारिक विद्यालयी शिक्षा से बहुत पहले हो जाती है।
संख्या बोध (Number Sense) क्या है?
संख्या बोध वह प्रारंभिक क्षमता है जिसके माध्यम से व्यक्ति बिना गिने यह पहचान सकता है कि किसी छोटे समूह में वस्तुओं की संख्या बदली है या नहीं।
उदाहरण के लिए—
- मेज पर दो गेंदें रखी हैं।
- यदि बिना गिने उनमें एक गेंद और जोड़ दी जाए, तो अधिकांश छोटे शिशु भी इस परिवर्तन पर अधिक ध्यान देते हैं।
- वे “तीन” शब्द नहीं जानते, लेकिन उन्हें यह अनुभव होता है कि समूह की मात्रा बदल गई है।
ध्यान देने योग्य बात यह है कि यह गिनती (Counting) नहीं है, बल्कि मात्रा की सहज पहचान (Perception of Quantity) है।
शिशुओं में संख्या बोध पर प्रारंभिक शोध
1. स्टार्की और कूपर (Starkey & Cooper, 1980)
1980 में मनोवैज्ञानिक Prentice Starkey और Richard Cooper ने एक महत्वपूर्ण अध्ययन किया जिसमें लगभग 16 से 30 सप्ताह आयु के शिशुओं को शामिल किया गया।
शोधकर्ताओं ने शिशुओं के सामने अलग-अलग स्लाइड प्रस्तुत कीं।
पहले चरण में शिशुओं को दो बिंदुओं वाली स्लाइड दिखाई गई।
इसके बाद तीन बिंदुओं वाली स्लाइड प्रस्तुत की गई।
शोधकर्ताओं ने यह नहीं देखा कि शिशु उत्तर दे सकते हैं या नहीं, बल्कि उन्होंने यह मापा कि शिशु प्रत्येक चित्र को कितनी देर तक देखते हैं (Looking Time Method)।
अध्ययन में पाया गया कि जब दो बिंदुओं से तीन बिंदुओं वाली स्लाइड दिखाई गई, तो शिशुओं का देखने का औसत समय उल्लेखनीय रूप से बढ़ गया।
यह परिणाम बताता है कि शिशुओं ने मात्रा में हुए परिवर्तन को पहचान लिया था।
महत्वपूर्ण बात यह है कि शिशुओं को गिनना नहीं आता था, फिर भी वे “दो” और “तीन” के बीच अंतर महसूस कर पा रहे थे।
2. स्ट्रॉस और कर्टिस (Strauss & Curtis, 1981)
1981 में किए गए एक अन्य अध्ययन में शोधकर्ताओं ने केवल बिंदुओं का उपयोग नहीं किया, बल्कि रंगीन वस्तुओं की तस्वीरों का प्रयोग किया।
इस अध्ययन में विशेष सावधानी बरती गई कि—
- वस्तुओं का आकार बदलता रहे,
- वस्तुओं का रंग बदलता रहे,
- वस्तुओं की स्थिति बदलती रहे,
लेकिन वस्तुओं की संख्या नियंत्रित (constant) रखी जाए।
इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि शिशु आकार या रंग नहीं, बल्कि वास्तव में मात्रा (Quantity) में परिवर्तन पर प्रतिक्रिया दे रहे हैं।
परिणाम पहले अध्ययन के समान थे।
जब वस्तुओं की संख्या दो से तीन हुई, तो शिशुओं ने चित्रों को अधिक समय तक देखा।
इससे यह स्पष्ट हुआ कि शिशु केवल आकृति या रंग नहीं पहचान रहे थे, बल्कि वस्तुओं की संख्या में हुए परिवर्तन को भी महसूस कर रहे थे।
इन अध्ययनों से क्या निष्कर्ष निकलता है?
इन दोनों तथा बाद के अनेक अध्ययनों से एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष सामने आया—
शिशु छोटी मात्राओं में अंतर पहचान सकते हैं, भले ही वे गिनना न जानते हों।
अर्थात—
- वे “एक”, “दो” या “तीन” शब्द नहीं जानते,
- वे मौखिक गिनती नहीं कर सकते,
- फिर भी वे छोटी संख्यात्मक मात्राओं के परिवर्तन को पहचान लेते हैं।
इसी प्रारंभिक क्षमता को न्यूमेरोसिटी (Numerosity) या प्रारंभिक संख्या बोध (Early Number Sense) कहा जाता है।
क्या यह क्षमता जन्मजात होती है?
यह प्रश्न अभी भी शोध का विषय है, लेकिन अधिकांश आधुनिक शोध यह संकेत देते हैं कि संख्या बोध का एक मूलभूत आधार जन्मजात (Innate) होता है।
यदि कुछ ही सप्ताह के शिशु बिना किसी औपचारिक अनुभव के छोटी मात्राओं में अंतर पहचान लेते हैं, तो यह मानना कठिन है कि उन्होंने यह क्षमता इतने कम समय में केवल पर्यावरण से सीख ली होगी।
इसी कारण कई संज्ञानात्मक वैज्ञानिक मानते हैं कि मानव मस्तिष्क में मात्रा को पहचानने की एक प्रारंभिक जैविक व्यवस्था (Biological Foundation) पहले से मौजूद होती है, जिस पर आगे का गणितीय अधिगम निर्मित होता है।
हालाँकि, यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि जन्मजात संख्या बोध का अर्थ यह नहीं है कि बच्चे जन्म से गणित जानते हैं। विद्यालय में सीखी जाने वाली गणित—जैसे गिनती, जोड़, घटाव, गुणा, भाग, भिन्न और बीजगणित—सभी अनुभव, शिक्षण और अभ्यास के माध्यम से विकसित होती हैं।
तंत्रिका विज्ञान (Neuroscience) से प्राप्त प्रमाण
संख्या बोध की जैविक प्रकृति के समर्थन में तंत्रिका विज्ञान से भी महत्वपूर्ण प्रमाण प्राप्त हुए हैं।
गणितीय संज्ञान के प्रसिद्ध शोधकर्ता Brian Butterworth ने ऐसे रोगियों का वर्णन किया है जिनमें मस्तिष्क के विशेष भागों को क्षति पहुँचने के बाद संख्या संबंधी क्षमताएँ प्रभावित हो गईं।
कुछ मामलों में—
- भाषा सामान्य रही,
- सामान्य तर्क क्षमता भी सुरक्षित रही,
लेकिन व्यक्ति—
- संख्याओं का अर्थ समझने में कठिनाई महसूस करने लगा,
- सरल गणनाएँ नहीं कर पाया,
- छोटी मात्राओं की पहचान भी प्रभावित हो गई।
ये अध्ययन संकेत देते हैं कि संख्या संबंधी प्रक्रियाएँ मस्तिष्क के विशिष्ट तंत्रों से जुड़ी होती हैं और भाषा या सामान्य बुद्धि से पूरी तरह समान नहीं हैं।
टोबियास डैन्टज़िग का दृष्टिकोण
गणित के इतिहासकार Tobias Dantzig अपनी प्रसिद्ध पुस्तक Number: The Language of Science में लिखते हैं कि मनुष्य अपने विकास के प्रारंभिक स्तरों पर ही ऐसी क्षमता रखता है जिसके माध्यम से वह छोटे समूहों में हुए परिवर्तन को पहचान सकता है।
यदि किसी छोटे समूह में कोई वस्तु जोड़ दी जाए या हटा दी जाए, तो व्यक्ति बिना गिने भी यह अनुभव कर सकता है कि समूह बदल गया है।
यद्यपि आज के शोध इस विचार को अधिक वैज्ञानिक रूप से समझाते हैं, डैन्टज़िग का यह अवलोकन आधुनिक संख्या बोध संबंधी शोधों के अनुरूप प्रतीत होता है।
शिक्षकों और अभिभावकों के लिए इसका क्या अर्थ है?
यदि बच्चे प्रारंभिक संख्या बोध के साथ जन्म लेते हैं, तो प्रारंभिक गणित शिक्षा का उद्देश्य केवल गिनती सिखाना नहीं होना चाहिए।
शिक्षण में ऐसे अनुभव शामिल होने चाहिए जिनसे बच्चे—
- छोटी मात्राओं की तुलना करें,
- बिना गिने मात्रा पहचानें,
- वस्तुओं को जोड़ने और हटाने के प्रभाव को देखें,
- “ज्यादा”, “कम” और “बराबर” जैसे संबंधों को समझें,
- वस्तुओं के समूहों के साथ नियमित रूप से कार्य करें।
इसी आधार पर आगे चलकर गिनती, संख्या ज्ञान, जोड़, घटाव और उच्च स्तरीय गणितीय सोच विकसित होती है।
निष्कर्ष
आधुनिक शोध यह संकेत देते हैं कि संख्या बोध मानव विकास की अत्यंत प्रारंभिक क्षमता है। कुछ महीनों के शिशु भी छोटी मात्राओं में परिवर्तन को पहचान सकते हैं, जबकि उन्हें गिनना नहीं आता। यह क्षमता गणितीय अधिगम की आधारशिला है, लेकिन यह अपने आप पर्याप्त नहीं होती। समृद्ध अनुभव, गुणवत्तापूर्ण शिक्षण और व्यवस्थित अभ्यास ही इस प्रारंभिक क्षमता को पूर्ण गणितीय दक्षता में विकसित करते हैं।
प्रमुख संदर्भ
- Starkey, P., & Cooper, R. G. (1980). Perception of Numbers by Human Infants.
- Strauss, M. S., & Curtis, L. E. (1981). Infants’ Perception of Numerosity.
- Butterworth, B. (1999). The Mathematical Brain.
- Dantzig, T. (1954). Number: The Language of Science.
- Dehaene, S. (1997). The Number Sense: How the Mind Creates Mathematics.